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गांव गया था गांव से भागा कविता - कैलाश गौतम

गांव गया था, गांव से भागा...
रामराज का हाल देखकर,
पंचायत की चाल देखकर...
आंगन में दीवाल देखकर,
सिर पर आती डाल देखकर...
नदी का पानी लाल देखकर,
और आंख में बाल देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
सरकारी स्कीम देखकर,
बालू में से क्रीम देखकर...
देह बनाती टीम देखकर,
हवा में उड़ता भीम देखकर...
सौ-सौ नीम हकीम देखकर,
गिरवी राम-रहीम देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
जला हुआ खलिहान देखकर,
नेता का दालान देखकर...
मुस्काता शैतान देखकर,
घिघियाता इंसान देखकर...
कहीं नहीं ईमान देखकर,
बोझ हुआ मेहमान देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
नए धनी का रंग देखकर,
रंग हुआ बदरंग देखकर...
बातचीत का ढंग देखकर,
कुएं-कुएं में भंग देखकर...
झूठी शान उमंग देखकर,
पुलिस चोर के संग देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
बिना टिकट बारात देखकर,
टाट देखकर, भात देखकर...
वही ढाक के पात देखकर,
पोखर में नवजात देखकर...
पड़ी पेट पर लात देखकर,
मैं अपनी औकात देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
नए-नए हथियार देखकर,
लहू-लहू त्योहार देखकर...
झूठ की जै-जैकार देखकर,
सच पर पड़ती मार देखकर...
भगतिन का शृंगार देखकर,
गिरी व्यास की लार देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

गांव गया था, गांव से भागा...
मुठ्ठी में कानून देखकर,
किचकिच दोनों जून देखकर...
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर,
गंजे को नाखून देखकर...
उजबक अफ़लातून देखकर,
पंडित का सैलून देखकर...
गांव गया था, गांव से भागा...

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