सिसीफस ग्रीस का एक बेहद चालाक राजा था। उसने अपनी चालाकी से कई बार देवताओं को धोखा दिया और यहाँ तक कि 'मृत्यु' (Thanatos) को ही जंजीरों में बांध दिया, जिससे दुनिया में लोगों ने मरना बंद कर दिया।
देवता उससे बेहद नाराज हो गए। उसे सबक सिखाने के लिए उन्होंने सिसीफस को एक अजीब और कभी न खत्म होने वाली सजा दी:
सिसीफस को एक बहुत भारी, बड़े पत्थर को धकेलते हुए एक ऊंचे पहाड़ की चोटी तक ले जाना होता था।
जैसे ही वह पूरी ताकत लगाकर पत्थर को चोटी पर पहुंचाता, पत्थर अपने वजन के कारण वापस लुढ़क कर नीचे घाटी में आ गिरता। सिसीफस को फिर से नीचे आना पड़ता और उस पत्थर को ऊपर धकेलना पड़ता। यह सिलसिला अनंत काल तक, बिना रुके बस चलता ही रहना था।
1942 में अल्बर्ट कामू ने इस कहानी पर एक मशहूर एस्से लिखा। उन्होंने कहा कि सिसीफस की यह सजा असल में हम इंसानों की जिंदगी का रूपक है। कामू ने इसके जरिए अपनी फिलॉसफी दी, जिसे Absurdism कहा जाता है।
कामू के मुताबिक:
जिंदगी का कोई बना-बनाया मतलब नहीं है: हम हर दिन सुबह उठते हैं, तैयार होते हैं, काम पर जाते हैं, घर आते हैं, सो जाते हैं और अगले दिन फिर वही करते हैं। हम जिंदगी में कुछ बड़ा हासिल करने के लिए जो 'पत्थर' रोज ऊपर धकेलते हैं, मौत आते ही वह पत्थर वापस नीचे गिर जाता है। सब कुछ शून्य हो जाता है।
इंसान लगातार अपनी जिंदगी में एक गहरा 'मतलब' या 'परपज' ढूंढना चाहता है, लेकिन यह ब्रह्मांड बिल्कुल खामोश और बेपरवाह है। इस टकराव को कामू ने 'The Absurd' कहा है।
कामू कहते हैं कि जब हमें पता चल जाए कि जिंदगी का कोई तय मतलब नहीं है, तो हार मानकर बैठ जाना या सुसाइड कर लेना रास्ता नहीं है। असली बहादुरी विद्रोह में है।
जब सिसीफस पत्थर के पीछे-पीछे वापस नीचे घाटी की तरफ आ रहा होता है, तो उस खाली वक्त में उसे अपनी पूरी सच्चाई का पता होता है। वह जानता है कि उसकी मेहनत का कोई अंत नहीं है, फिर भी वह मुस्कुराता है और दोबारा पत्थर उठाने चल देता है। अपनी इस निरर्थक सजा को खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना ही देवताओं के खिलाफ उसका सबसे बड़ा विद्रोह है।
कामू ने अपने एस्से का अंत इस बेहद मशहूर लाइन से किया था:
"One must imagine Sisyphus happy."
(हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि सिसीफस खुश है।)
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